शुन्य का अनंत सफ़र

मैं शुन्य के सफ़र पे हूँ,
मेरा आरंभ हीं शायद मेरा अंत है,
परंतु मेरा रास्ता अनंत है|

मैं अकेला नही हू इस सफ़र में
तुम सब मेरे राहदार हो|
बस थोड़ा खुद के बंदी हो,
या वक़्त के कर्ज़दार हो|

मुझपर समय की कोई पाबंदी नहीं है,
तुम्हारी दुनिया के नियमों से,
मेरी कोई संधि नहीं है|

राम सा पौरुष है मेरा,
रावण सा अहंकार है|
कृष्ण सा छल है मेरा,
युधिष्ठिर सा व्यवहार है|

शिव हूँ मैं, रुद्र भी मेरा रूप है,
तुम्हारी राह का छाँव हूँ मैं,
तुम्हारे सर पर मेरी ही धूप है|

प्रकृति के हर कण में मैं हूँ,
नभ, धरा और जल में मैं हूँ|
सब जो तू सोचे तेरा है,
उस सब चल और अचल में मैं हूँ |

जो सोच तू सोचे तूने अपनाई है,
हर उस सोच में मेरी ही वाणी समाई है|
तुम्हारा मिथ्या भी मैं और सत्य भी मैं हूँ,
तुम्हारा विश्वास भी मैं और असत्य भी मैं हूँ|

तेरा ज्ञान जो तुझमे व्यापी है,
मेरे ही अनुभव से तुमने भाँपी है|
जीवन का पूरा जो तुम्हारा चक्र है,
मेरे सफ़र का बस छोटा सा वक्र है,

क्यूँ की, मैं शून्य के सफ़र पे हूँ;
और जहाँ तुम्हारा अंत है,
वहाँ से शुरू मेरा अनंत है|

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